गर्भवती की समय पर कराएं सभी जरूरी जांच ताकि जच्चा-बच्चा पर न आए कोई आंच - मुकेश शर्मा



  • राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस (11 अप्रैल) पर विशेष

गर्भवती और नवजात के खास देखभाल पर सरकार और स्वास्थ्य विभाग का पूरा जोर है। प्रसव पूर्व जरूरी चार बार की जांच के लिए प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान चलाया जा रहा है। इस अभियान के तहत महीने की 1, 9, 16 और 24 तारीख को स्वास्थ्य केन्द्रों पर प्रशिक्षित चिकित्सक द्वारा गर्भवती के जांच की विशेष व्यवस्था की जाती है। गर्भवती के पोषण का ख्याल रखने के लिए प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के तहत बैंक खाते में निर्धारित धनराशि देने की भी व्यवस्था है। स्वास्थ्य केन्द्रों पर गुणवत्तापूर्ण प्रसव सुविधाएँ और एम्बुलेंस की सुविधा उपलब्ध हैं। प्रसव बाद भी जच्चा-बच्चा की देखभाल की खास व्यवस्था है। यह सारी व्यवस्थाएं इसलिए की गयी हैं ताकि जच्चा-बच्चा का जीवन खुशहाल बन सके और मातृ एवं शिशु मृत्यु दर के आंकड़े में कमी लायी जा सके। इस बारे में समुदाय में जागरूकता की अलख जगाने के साथ ही हर साल 11 अप्रैल को राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस मनाया जाता है। इस दिवस का मूल मकसद समुदाय के हर वर्ग को यह बताना है कि जच्चा-बच्चा की खुशहाली के लिए सरकार द्वारा की गयीं व्यवस्थाओं का लाभ उठाने के लिए लोग आगे आयें और जच्चा-बच्चा का जीवन खुशहाल बनाएं।

प्रसव पूर्व चार जरूरी जांच का महत्व इसलिए भी है कि अगर किसी तरह का जोखिम हो तो उसे समय रहते दूर किया जा सके। जांच में यह जरूर पता किया जाता है कि गर्भवती का दो या उससे अधिक बार बच्चा गिर तो नहीं गया है या एबार्शन तो नहीं हुआ है। बच्चे की पेट में मृत्यु हो गयी हो या पैदा होते ही मृत्यु हो गयी हो, कोई विकृति वाला बच्चा पैदा हुआ हो, प्रसव के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव हुआ हो या पहला प्रसव बड़े आपरेशन से हुआ हो तो उसे जटिलता वाली गर्भवती (एचआरपी) के रूप में चिन्हित कर सुरक्षित प्रसव के हरसम्भव प्रयास किए जाते हैं। इसके साथ ही यह भी पता किया जाता है कि गर्भवती को पहले से कोई बीमारी तो नहीं है, जैसे- उच्च रक्तचाप, डायबिटीज, दिल, गुर्दे, मिर्गी या टीबी  की बीमारी, पीलिया, लीवर की बीमारी, हाइपो थायराइड आदि। यदि इस तरह की कोई बीमारी गर्भवती में पहले से है तो भी उसकी खास देखभाल कर सुरक्षित मातृत्व सुख प्रदान करने की पूरी कोशिश की जाती है। वर्तमान गर्भावस्था की बारीकी से परख की जाती है ताकि समय से पता चल सके कि गर्भवती गंभीर एनीमिया (सात ग्राम से कम हीमोग्लोबिन) की शिकार तो नहीं है। ब्लड प्रेशर की जांच कर उसे सामान्य रखने की कोशिश की जाती है। गर्भ में बच्चा आड़ा या तिरछा तो नहीं है। चौथे महीने के बाद खून आना, गर्भावस्था में डायबीटीज का पता चलना या एचआईवी या किसी अन्य बीमारी से ग्रसित होने का पता चलता है तो विशेष प्रबन्धन कर सुरक्षित प्रसव कराने की कोशिश की जाती है। इसलिए जच्चा-बच्चा की खुशहाली इसी में है कि गर्भावस्था का पता चलते ही जल्दी से जल्दी निकटतम स्वास्थ्य केंद्र में पंजीकरण कराएं ताकि सभी सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं को प्राप्त करने की हकदार बन सकें।

प्रसव से पहले प्रशिक्षित चिकित्सक द्वारा जांच करने से गर्भवती को सभी जरूरी परामर्श भी मिल जाते हैं, जिसका पालन करते हुए वह सुरक्षित मातृत्व सुख का लाभ उठा सकती हैं। इसके साथ ही उन्हें परिवार नियोजन की सुविधाओं के बारे में भी अवगत कराया जाता है ताकि वह अपने मनमुताबिक साधनों को अपनाकर दूसरे बच्चे की योजना तीन साल बाद ही आसानी से बना सकें, क्योंकि प्रसव के तीन साल बाद ही महिला का शरीर दूसरे गर्भधारण के योग्य बन पाता है। महिलाओं, युवतियों और किशोरियों को अपने खानपान का खास ख्याल रखना चाहिए ताकि जरूरत के मुताबिक़ शरीर को आयरन, कैल्शियम और प्रोटीन मिलता रहे और एनीमिया की गिरफ्त में वह न आने पायें। इसके लिए जरूरी है कि वह ऐसे खाद्य पदार्थों को अपनी थाली में शामिल करें जो कि इन गुणों से भरपूर होते हैं। गर्भवती खाने में हरी साग-सब्जी, फल का ज्यादा इस्तेमाल करें और चिकित्सक की सलाह के मुताबिक़ आयरन और कैल्शियम की गोलियों का सेवन करें। प्रसव का समय निकट आने पर सुरक्षित प्रसव के लिए घर-परिवार की सलाह से निकटतम अस्पताल का चयन पहले से कर लेना चाहिए। रजिस्ट्रेशन के समय मिले मातृ-शिशु सुरक्षा कार्ड, जरूरी कपड़े साथ रखें और एम्बुलेंस का नम्बर भी याद रखें, ताकि किसी आपात स्थिति का प्रबन्धन आसानी से किया जा सके। इसमें स्थानीय आशा कार्यकर्ता भी अहम भूमिका निभा रही हैं। गर्भावस्था का पता चलते ही रजिस्ट्रेशन कराने से लेकर संस्थागत प्रसव के लिए गर्भवती को अस्पताल तक पहुँचाने और मनोबल बढाने के लिए वह हर वक्त उनके साथ मुस्तैद रहती हैं।  

संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने के लिए ही सरकार द्वारा जननी सुरक्षा योजना संचालित की जा रही है, जिसके तहत उनको एक निर्धारित राशि भी दी जाती है और गर्भवती को एम्बुलेंस से घर से अस्पताल लाने और घर तक पहुंचाने की भी व्यवस्था की जाती है। प्रसव के बाद 48 घंटों तक अस्पताल में रोककर जरूरी देखभाल के साथ जरूरी टीकाकरण भी किया जाता है। जन्म के तुरंत बाद नवजात की देखभाल के लिए जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम भी संचालित किया जाता है। इसके अलावा सुरक्षित मातृत्व आश्वासन योजना (सुमन) भी संचालित की जा रही है, जिसके तहत सार्वजनिक स्वास्थ्य केद्रों पर गर्भवती और नवजात को प्रसव के बाद छह महीने तक नि:शुल्क, सम्मानजनक और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान की जाती हैं। इसका भी उद्देश्य मातृ एवं नवजात मृत्यु दर को शून्य पर लाना है। इसलिए आज के दिन घर के बड़े-बुजुर्गों को यह संकल्प लेना चाहिए कि वह परिवार की गर्भवती को सभी स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ दिलाने के लिए गर्भावस्था का पता चलते ही स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र पर रजिस्ट्रेशन जरूर कराएँगे और समय-समय पर जरूरी जांच के साथ खानपान का भी पूरा ख्याल रखेंगे ताकि जच्चा-बच्चा को खुशहाल जीवन प्रदान करने का सौभाग्य उन्हें मिल सके।   

 

 (लेखक पापुलेशन सर्विसेज इंटरनेशनल इंडिया के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर हैं)