समकालीन भारतीय बौद्धिक परिदृश्य में ऐसी पुस्तकें विरल हैं, जो एक साथ पत्रकारिता, संस्कृति, भाषा, शिक्षा, लोकतंत्र और भारतीय चिंतन की बहुआयामी यात्रा का विश्वसनीय दस्तावेज बन सकें। प्रो. संजय द्विवेदी का शिल्पायन से सद्यः प्रकाशित व्याख्यान संग्रह ‘संजय उवाच’ केवल उनके व्याख्यानों का संकलन नहीं, अपितु भारतीय मन, मीडिया और समाज के अंतर्द्वंद्वों का वैचारिक मानचित्र है। 45 अध्यायों में विस्तृत यह कृति वर्तमान समय के बौद्धिक संकटों के बीच भारतीय दृष्टि की पुनर्स्थापना का सशक्त प्रयास करती है। पुस्तक के शीर्षक से ही स्पष्ट हो जाता है कि लेखक केवल वक्ता नहीं, बल्कि एक ऐसे चिंतक हैं जो संवाद को समाज परिवर्तन का माध्यम मानते हैं। पुस्तक की भूमिका में छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने ठीक ही लिखा है कि-“संजय उवाच को पढ़ना मानो विचारों की भारत यात्रा में शामिल होना है।”
पुस्तक का सबसे बड़ा वैशिष्ट्य इसका संवादधर्मी स्वर है। लेखक उपदेशक की मुद्रा में नहीं, बल्कि एक सहयात्री चिंतक के रूप में पाठक से संवाद करता है। प्राक्कथन ‘मन की बात’ में उल्लिखित ‘वाक् शक्ति’ की अवधारणा पुस्तक की आत्मा है। प्रो. द्विवेदी संवाद को केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि सभ्यता की प्राणशक्ति मानते हैं। उनके अनुसार संवाद ही वह शक्ति है, जो समाज को विभाजन से विमर्श और अंधकार से बौद्धिक आलोक की ओर ले जाती है। यही कारण है कि पुस्तक का प्रथम अध्याय ‘संवाद से बनेगी सुंदर दुनिया’ केवल प्रेरक लेख नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक सहअस्तित्व का सांस्कृतिक घोषणापत्र प्रतीत होता है।
मीडिया विमर्श पर लेखक की दृष्टि विशेष रूप से उल्लेखनीय है। ऐसे समय में जब पत्रकारिता बाजारवाद, तात्कालिकता और वैचारिक ध्रुवीकरण के दबावों से जूझ रही है, लेखक मीडिया को पुनः ‘सरोकार’ से जोड़ने का आग्रह करता है। वे स्पष्ट करते हैं कि पत्रकारिता महज सूचना उद्योग नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का नैतिक दायित्व है। ‘जड़ों की ओर लौटे मीडिया’ जैसे अध्यायों में भारतीय लोकजीवन, मानवीय संवेदना और सामाजिक प्रतिबद्धता को मीडिया का मूल आधार बताया गया है। ओड़िया संत-कवि भीम भोई की करुणा-दृष्टि को उद्धृत करते हुए लेखक मीडिया को जनकल्याण और राष्ट्र-निर्माण का माध्यम बनाने की प्रेरणा देता है।
इसी प्रकार पुस्तक का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष मीडिया शिक्षा और डिजिटल युग पर उसका गंभीर चिंतन है। प्रो. द्विवेदी भारतीय मीडिया शिक्षा के औपनिवेशिक ढाँचे पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं। वे पूछते हैं कि भारतीय मीडिया संस्थानों में भारतीय संदर्भ, भारतीय भाषाएँ और भारतीय अनुभव अभी भी हाशिए पर क्यों हैं। यह प्रश्न केवल शिक्षा का नहीं, बल्कि बौद्धिक आत्मनिर्भरता का प्रश्न है। लेखक नवाचार, री-स्किलिंग और मीडिया साक्षरता को डिजिटल युग की अनिवार्य शर्त मानते हैं। ‘फेक न्यूज’ और सूचना-अराजकता के इस दौर में उनका यह आग्रह अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत होता है कि मीडिया साक्षरता को सामाजिक आंदोलन का रूप दिया जाना चाहिए।
समकालीन भाषायी विमर्श के सन्दर्भ में लेखक की दृष्टि विशेष रूप से संवेदनशील और भारतीयता से अनुप्राणित है साथ ही भाषा और सांस्कृतिक अस्मिता पर वह अंग्रेजी के वर्चस्व को भारतीय भाषायी संवाद के लिए एक गंभीर चुनौती मानते हैं साथ ही हिंदी को भारतीय एकता की स्वाभाविक सेतु-भाषा के रूप में स्थापित करते हैं। किंतु उनका हिंदी-विमर्श किसी भाषाई वर्चस्व का आग्रह नहीं, बल्कि भारतीय भाषाओं के सामूहिक सम्मान का पक्षधर है। ‘भाषा है सिनेमा की शक्ति’ अध्याय में हिंदी सिनेमा की वैश्विक स्वीकार्यता को भारतीय सांस्कृतिक प्रभाव और ‘सॉफ्ट पावर’ के रूप में देखा गया है। राज कपूर से लेकर लोकभाषाओं तक लेखक ने भाषा को केवल संप्रेषण नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्मृति और राष्ट्रीय अस्मिता का वाहक माना है।
पुस्तक का वैचारिक विस्तार इसे और अधिक महत्त्वपूर्ण बनाता है। डॉ. भीमराव अंबेडकर, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, पंडित दीनदयाल उपाध्याय और तुलसीदास जैसे व्यक्तित्वों पर लेखक का चिंतन भारतीय समाज के विविध आयामों को समेटता है। ‘सबके हैं – सबमें हैं तुलसी के राम’ तथा ‘मुसलमान, हिंदू और हिन्दुस्तानियत’ जैसे अध्याय सामाजिक समरसता और साझा सांस्कृतिक विरासत के प्रश्नों को अत्यंत संतुलित और मानवीय दृष्टि से प्रस्तुत करते हैं। लेखक भारत को मात्र राजनीतिक राष्ट्र-राज्य नहीं, बल्कि करुणा, सहअस्तित्व और सांस्कृतिक निरंतरता से निर्मित एक जीवंत सभ्यता के रूप में देखते हैं।
नई शिक्षा नीति, सुशासन और आत्मनिर्भर भारत पर पुस्तक के विचार भी अत्यंत सार्थक हैं। लेखक ‘गवर्नमेंट’ से आगे बढ़कर ‘गवर्नेंस’ की अवधारणा को जनसंवाद और लोकभागीदारी से जोड़ते हैं। शिक्षा के संदर्भ में वे रटंत व्यवस्था से मुक्त होकर तार्किकता, सृजनात्मकता और भारतीय ज्ञान परंपरा आधारित शिक्षा की आवश्यकता पर बल देते हैं। उनका विश्वास है कि भारत का भविष्य केवल तकनीकी दक्षता में नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मविश्वास और बौद्धिक स्वाधीनता में निहित है।
शैली की दृष्टि से भी ‘संजय उवाच’ उल्लेखनीय कृति है। प्रो. संजय द्विवेदी की भाषा सहज, प्रवाहपूर्ण और वैचारिक गरिमा से संपन्न है। उनकी लेखनी में पत्रकार की तथ्यपरकता, शिक्षक की स्पष्टता और चिंतक की गहराई एक साथ उपस्थित दिखाई देती है। कहीं भी अनावश्यक बौद्धिक जटिलता नहीं है, फिर भी विचारों की गंभीरता पाठक को लगातार आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती है। उनकी भाषा में भारतीय संवेदना का वह आलोक है, जो वैदिक चेतना और आधुनिक विवेक के सुंदर समन्वय के रूप में उभरता है।
समग्रतः, ‘संजय उवाच’ हमारे समय के वैचारिक और सांस्कृतिक संकटों के बीच भारतीय दृष्टि की पुनर्प्रतिष्ठा का महत्वपूर्ण दस्तावेज है। यह पुस्तक केवल मीडिया या संचार के विद्यार्थियों के लिए ही नहीं, बल्कि हर उस गंभीर पाठक के लिए आवश्यक है जो भारत, भारतीयता, लोकतंत्र, भाषा और सांस्कृतिक चेतना के अंतर्संबंधों को गहराई से समझना चाहता है। यह कृति अंततः हमें यही स्मरण कराती है कि सभ्यता का वास्तविक आधार शक्ति नहीं, बल्कि संवाद है; और संवाद तभी सार्थक होता है, जब उसमें सत्य, संवेदना और समाज के प्रति उत्तरदायित्व का भाव उपस्थित हो।
(डा. रजनीश अग्रहरि(समीक्षक) हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय, सागर में उपाचार्य हैं।)