सफलता को मापने के लिए गलत पैमाने का उपयोग कर रहे विश्वविद्यालय व उच्च शिक्षण संस्थान - निशा सिंह



  • 25 वर्षों में विश्वविद्यालयों की संख्या तो 254 से बढ़कर 1,200 से अधिक हुई, लेकिन रोजगार योग्यता में नहीं हुई उसके मुताबिक़ बढ़ोत्तरी

भारत ने विश्वविद्यालयों के विस्तार पर जिस गति से काम किया है, उसकी बराबरी दुनिया के बहुत कम देश कर सकते हैं। मात्र 25 वर्षों में विश्वविद्यालयों की संख्या 254 से बढ़कर 1,200 से अधिक हो गई है। हालांकि इस विस्तार के पीछे एक ऐसा सवाल छिपा है, जो केवल उच्च शिक्षा तक पहुँच से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है कि क्या हमारे स्नातक वास्तव में कार्यस्थल के लिए तैयार होकर निकल रहे हैं?

आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के अनुसार वर्ष 2000 में लगभग 254 विश्वविद्यालयों वाला भारत 2024 तक 1,200 से अधिक विश्वविद्यालयों तक पहुँच गया, यानि लगभग 380 प्रतिशत की वृद्धि। इसके साथ 70,018 उच्च शिक्षण संस्थान, 4.3 करोड़ से अधिक नामांकित विद्यार्थी और विश्व की प्रतिष्ठित क्यूएस (QS) विश्वविद्यालय रैंकिंग 2026 में शामिल 54 भारतीय विश्वविद्यालय भी हैं। तस्वीर देखने में जरूर उत्साहजनक हैं, लेकिन इसकी वास्तविकता कुछ और कहानी कहती है।

कौशल विकास, रोजगार योग्यता और कार्यबल तैयारी के क्षेत्र में काम करते हुए एक बात स्पष्ट रूप से देखी है कि भारत में डिग्रियों की कमी नहीं है, कमी है उन क्षमताओं की, जिन्हें विकसित करने के लिए डिग्रियाँ दी जाती हैं। सात उद्योग क्षेत्रों के एक लाख से अधिक अभ्यर्थियों के आकलन पर आधारित इंडिया स्किल्स रिपोर्ट 2026 इस वास्तविकता को उजागर करती है। आईटीआई स्नातकों की रोजगार योग्यता 45.95 प्रतिशत है, जबकि पॉलिटेक्निक स्नातकों की मात्र 32.92 प्रतिशत। यहाँ तक कि कार्यस्थल के लिए अपेक्षाकृत तैयार माने जाने वाले एमबीए स्नातकों की रोजगार योग्यता भी एक वर्ष में 78 प्रतिशत से घटकर 72.76 प्रतिशत रह गई। इंजीनियरिंग स्नातकों की स्थिति लगभग 70 प्रतिशत पर बनी हुई है, लेकिन यह बढ़त मुख्यतः कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और डेटा एनालिटिक्स जैसे क्षेत्रों तक सीमित है। अन्य अनेक विषयों के छात्र ऐसे श्रम बाजार में संघर्ष कर रहे हैं, जिसकी कौशल आवश्यकताएँ शैक्षणिक पाठ्यक्रमों की तुलना में कहीं अधिक तेजी से बदल रही हैं।

इसका अर्थ गंभीर है। अनेक विषयों में बड़ी संख्या में स्नातक ऐसे कौशलों के बिना रोजगार बाजार में प्रवेश कर रहे हैं, जिनकी आज नियोक्ता बढ़ती हुई अपेक्षा कर रहे हैं। यह समस्या नई नहीं है। इंडिया स्किल्स रिपोर्ट 2012 से रोजगार योग्यता का आकलन कर रही है और सभी विषयों का औसत कभी भी स्थायी रूप से 55 प्रतिशत से ऊपर नहीं जा पाया। दूसरी ओर राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने 2035 तक सकल नामांकन अनुपात (GER) को 50 प्रतिशत तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा है। नीति आयोग का अनुमान है कि इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए भारत को लगभग 2,500 विश्वविद्यालयों की आवश्यकता पड़ सकती है। महत्वाकांक्षा में कोई कमी नहीं है, लेकिन गुणवत्ता पर गंभीर चर्चा अभी शुरू भी नहीं हुई है।

सबसे बड़ी चिंता यह है कि हम सफलता को मापने के लिए गलत पैमानों का उपयोग कर रहे हैं। हम संस्थानों की संख्या गिनते हैं, नामांकन दरों का उत्सव मनाते हैं और वैश्विक रैंकिंग पर गर्व करते हैं। लेकिन हम यह नहीं मापते कि संस्थानों के भीतर प्राप्त शिक्षा वास्तव में विद्यार्थियों को कितनी क्षमता और रोजगार योग्यता प्रदान कर रही है। उद्योग जगत की कई रिपोर्ट लगातार यह संकेत दे रही हैं कि शैक्षणिक पाठ्यक्रमों और नियोक्ताओं की अपेक्षाओं के बीच गंभीर अंतर मौजूद है, विशेषकर उभरती प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में। कई बार विद्यार्थियों से ऐसे कौशलों की अपेक्षा की जाती है जिन्हें उनकी औपचारिक शिक्षा में पर्याप्त स्थान ही नहीं मिला होता। यह केवल कौशल-अंतर (Skills Gap) नहीं, बल्कि दो समानांतर दुनियाओं- डिग्री प्रदान करने वाली शिक्षा व्यवस्था और कौशल की मांग करने वाली अर्थव्यवस्था के बीच का संरचनात्मक विच्छेद है।

समस्या की जड़ें गहरी हैं। भारत के 43,000 से अधिक कॉलेजों का अधिकांश हिस्सा राज्य विश्वविद्यालयों से संबद्ध है, जहाँ पाठ्यक्रम संशोधन की प्रक्रिया धीमी और केंद्रीकृत है। एक स्वायत्त आईआईटी (IIT) कुछ महीनों में अपना पाठ्यक्रम अद्यतन कर सकता है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों के अनेक संबद्ध महाविद्यालयों को वर्षों तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है। यही वह भारत है जिसने वैश्विक नवाचार सूचकांक में 2014 के 76वें स्थान से 2024 में 39वें स्थान तक की छलांग लगाई है, लेकिन उसी भारत के प्रतिभाशाली युवा ऐसी शिक्षा व्यवस्था से गुजर रहे हैं जो उन्हें उस दुनिया के लिए तैयार कर रही है, जो उनके स्नातक होने तक बदल चुकी होती है।

इस स्थिति के लिए कोई एक पक्ष जिम्मेदार नहीं है। शिक्षकों की कमी, अनुसंधान में अपर्याप्त निवेश, प्रशासनिक चुनौतियाँ और व्यवस्था का विशाल आकार-सभी इसकी वजह हैं। फिर भी, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हमने गुणवत्ता की तुलना में संख्या, परिणामों की तुलना में पहुँच और दक्षता की तुलना में प्रमाणपत्र को अधिक महत्व दिया है। समाधान विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ाने में नहीं, बल्कि विश्वविद्यालयों और श्रम बाजार के बीच संबंधों को मजबूत बनाने में है। उद्योग अनुभव को वैकल्पिक क्रेडिट नहीं, बल्कि अनिवार्य घटक बनाया जाना चाहिए। पाठ्यक्रम संशोधन उद्योग की बदलती कौशल आवश्यकताओं के अनुरूप होने चाहिए और प्रत्यायन (Accreditation) का मूल्यांकन केवल भवनों और पुस्तकालयों तक सीमित न रहकर यह भी देखे कि स्नातकों को सार्थक रोजगार मिल रहा है या नहीं।

भारत का जनसांख्यिकीय लाभांश वास्तविक है, लेकिन इसकी समय-सीमा भी निश्चित है। युवा आबादी को कुशल कार्यबल में बदलने का अवसर हमेशा खुला नहीं रहेगा। आज भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था के सामने सबसे बड़ी चुनौती अधिक सीटें बढ़ाना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि हर सीट एक सक्षम, रोजगारयोग्य और भविष्य के लिए तैयार नागरिक तैयार करे। जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक विश्वविद्यालयों का विस्तार उपलब्धि तो कहलाएगा, लेकिन सफलता नहीं।

 

(लेखिका भारत के कौशल पारिस्थितिकी तंत्र में लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ एक कार्यबल विकास और कौशल नीति के रूप में कार्यरत हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)